कंगाल लेखक की मुलाकात एक मोहक चित्रकार से होती है, जो उसे धीरे-धीरे अपनी “परफेक्ट कृति” में ढालने लगता है। खरगोश को बचाने से लेकर उसे चीरने तक, विरोध से समर्पण तक—लेखक हर कदम पर टूटता जाता है। फिर वह बारह काँच के पात्र और कलाकार के लिए छोड़ी गई एक खाली जगह देखता है।